Sunday, 16 March 2014

मां मेरी…

मां मेरी…
जब से दूर हुआ हूं तुमसे
और ज़्यादा नज़दीक हुआ हूं
ऐसा नहीं था
पहले तुम्हारे करीब नहीं था
मगर इस गहराई का एहसास नही था
लेकिन आज इतना दूर होने के बाद
ऐसा लगता है
जैसे डूबा हुआ हूं मैं तुझमें
चारो ओर हवा-पानी बन कर
फैली हो तुम…
हर चेहरा तुम सा लगता है…
सबकी आंखों में दिखाई देता है
तुम्हारा प्यार
छिप जाना चाहता हूं
सबकी गोद में
बन कर तुम्हारा बेटा…
सर रख कर सोना चाहता हूं
सबकी गोद में।

जब कभी अकेलेपन का
दर्द कचोटता है,
चाहता हूं बुला लूं तुम्हे
शब्दों के सहारे अपने पास
मगर तुम्हारा प्रेम
तुम्हारा स्नेह
तुम्हारी विशालता
मेरे छोटे छोटे शब्दों में
बंध नहीं पाते
शब्द जालों को तोड़कर
अनन्त ब्रह्मांड में फैल जाते हैं…
मेरे कमज़ोर शब्द
टूट टूट कर पन्नों से
परे बिखर जाते हैं
और कोरे कागज पर
बच जाता है
सिर्फ़ एक शब्द
‘मां’
और आंखों से टपके
तेरी यादों के चंद मोती…

धर्मेन्द्र’मन्नु’

Thursday, 12 December 2013

उठो चलो बढाओ कदम

उठो चलो बढाओ कदम
जब तलक है दम में दम

मंज़िलों के आगे भी हैं
और मंज़िलें कई
खत्म हुई राह एक
दूसरी शुरु हुई
पडाव दर पडाव
नई पर्वतें चढेंगे हम

मोतियों के वास्ते
समन्दरों को छान लें
रौशनी के वास्ते
सूरज को आओ बांध लें
जगत के जर्रे जर्रे में
रौशनी भरेंगे हम

हवा से तेज़ बहते हैं
नदी से तेज़ धार है
सीने में हैं सच्चाईयां
होंठों पे प्रेम राग है…
ठान लेंगे दिल में जो

तो दुनिया को बदलेंगे हम्…

Dharmendra Mannu

Saturday, 18 May 2013

और दीवारों के गाल सुर्ख हो गये……


आज जब मैने बन्द कमरे से
खुद को उठाकर
सीधा उदग्र
लम्बी सी सड़क के उपर
रखा और कहा
ले चलो वहां जहां
ले जाना चाहो……
तो सड़क मुस्कुरा कर चल पड़ी
जब पंछी चहक रहे थे
और उनके सुर में सुर मिलाने के लिये
मैने गाना चाहा तो
हवाओं ने पेड़ की साखों पे
थपकियां देकर
साज़ बजाना शुरु कर दिया,और
पत्ते मंद मंद झूमने लगे
ये देखकर सूरज
हौले से हंस पड़ा
और उसके होंठो से
रंग झड़ने लगे,और मैं
उसमें भींगने लगा।
लौटा तो दीवारों ने घेर लिया
और कहा —
कहां चले गये थे
छोड़ कर हमें
उदास तन्हा अकेला ?
सुनकर ये मैने
खिड़कियां खोल दी और
जेब से रंग निकाल कर
फेंकने लगा उनपर
दोनो हाथों से, और
दीवारों के गाल सुर्ख हो गये……
                     धर्मेन्द्र मन्नु

Sunday, 17 June 2012

तुम्हारे जाने के बाद....


तुम्हारे जाने के बाद सोचुंगा मैं, जब ये दुनिया विरान हो जाएगी हवाओ मे तैरती खुशबू नही रहेगी चांद बदरुप हो जाएगा और चांदनी फ़िकी फ़िकी… पल सदियों में तब्दील हो जाएँगे … मगर मत कहो अभी कि एक ज़िन्दगी है इस हद से बाहर भी कहीं… अभी ये बातें मेरी समझ से परे है मैं सोचुंगा उसके बारे में तुम्हारे जाने के बाद मैं सोचुंगा मैने क्या खोया क्या पाया तुम्हारे साथ तुम्हारे जाने के बाद्… धर्मेन्द्र मन्नु

Thursday, 8 December 2011

वो कहते हैं कि कहीं कोई शोषण नही है....

वो कहते हैं कि कहीं कोई शोषण नही है
हड्डियों का ढांचा डाइटिंग है कुपोषण नही है

फ़टे कपड़ों के अंदर झांकती बेशर्म नज़रें
कैसे कोई समझाये इन्हे कि ये फ़ैशन नही है

मिटती ही नही भूख उसकी वो क्या करे
नही तो यहां कोई किसी का दुश्मन नही है

आटा चावल दाल ये रोज़ के तमाशे हैं
इन सब पर विचारना कोई चिन्तन नही है

कौड़ियों में मिलते हैं मजबूरी के मारे यहां
जिसकी मर्जी छोडे जाये कोई बंधन नही है

धर्मेन्द्र मन्नु

Saturday, 26 November 2011

बिन तेरे कुछ भी ना बटा...

बिन तेरे कुछ भी ना बटा
दर्द एक पल को ना घटा

ज़माने के हाथ में खंजर
चुभे जिस दर को मैं सटा

मांगने गया थोड़ी सी सीख
बदले में मेरा अंगूठा कटा

किस गली में ढूंढू तुझे खुदा
तू भी तो है कुनबों में बंटा

धर्मेन्द्र मन्नु

Wednesday, 9 November 2011

ज़िन्दगी समन्दर सी रही....

ज़िन्दगी समन्दर सी रही
प्यास फिर भी बाकी रही

कुछ तुमने कहा कुछ हमने
बात मगर फ़िर भी बाकी रही

रात गुजरी उनके ख्यालों में
सुबहा हुई तो नींद जाती रही

लहरों जैसी रही ज़िन्दगी
सांस आती रही जाती रही

सुबह तक सब ठीक ही था
रौशनी बाद में जाती रही

धर्मेन्द्र मन्नू