Saturday, 18 May 2013

और दीवारों के गाल सुर्ख हो गये……


आज जब मैने बन्द कमरे से
खुद को उठाकर
सीधा उदग्र
लम्बी सी सड़क के उपर
रखा और कहा
ले चलो वहां जहां
ले जाना चाहो……
तो सड़क मुस्कुरा कर चल पड़ी
जब पंछी चहक रहे थे
और उनके सुर में सुर मिलाने के लिये
मैने गाना चाहा तो
हवाओं ने पेड़ की साखों पे
थपकियां देकर
साज़ बजाना शुरु कर दिया,और
पत्ते मंद मंद झूमने लगे
ये देखकर सूरज
हौले से हंस पड़ा
और उसके होंठो से
रंग झड़ने लगे,और मैं
उसमें भींगने लगा।
लौटा तो दीवारों ने घेर लिया
और कहा —
कहां चले गये थे
छोड़ कर हमें
उदास तन्हा अकेला ?
सुनकर ये मैने
खिड़कियां खोल दी और
जेब से रंग निकाल कर
फेंकने लगा उनपर
दोनो हाथों से, और
दीवारों के गाल सुर्ख हो गये……
                     धर्मेन्द्र मन्नु

Sunday, 17 June 2012

तुम्हारे जाने के बाद....


तुम्हारे जाने के बाद सोचुंगा मैं, जब ये दुनिया विरान हो जाएगी हवाओ मे तैरती खुशबू नही रहेगी चांद बदरुप हो जाएगा और चांदनी फ़िकी फ़िकी… पल सदियों में तब्दील हो जाएँगे … मगर मत कहो अभी कि एक ज़िन्दगी है इस हद से बाहर भी कहीं… अभी ये बातें मेरी समझ से परे है मैं सोचुंगा उसके बारे में तुम्हारे जाने के बाद मैं सोचुंगा मैने क्या खोया क्या पाया तुम्हारे साथ तुम्हारे जाने के बाद्… धर्मेन्द्र मन्नु

Thursday, 8 December 2011

वो कहते हैं कि कहीं कोई शोषण नही है....

वो कहते हैं कि कहीं कोई शोषण नही है
हड्डियों का ढांचा डाइटिंग है कुपोषण नही है

फ़टे कपड़ों के अंदर झांकती बेशर्म नज़रें
कैसे कोई समझाये इन्हे कि ये फ़ैशन नही है

मिटती ही नही भूख उसकी वो क्या करे
नही तो यहां कोई किसी का दुश्मन नही है

आटा चावल दाल ये रोज़ के तमाशे हैं
इन सब पर विचारना कोई चिन्तन नही है

कौड़ियों में मिलते हैं मजबूरी के मारे यहां
जिसकी मर्जी छोडे जाये कोई बंधन नही है

धर्मेन्द्र मन्नु

Saturday, 26 November 2011

बिन तेरे कुछ भी ना बटा...

बिन तेरे कुछ भी ना बटा
दर्द एक पल को ना घटा

ज़माने के हाथ में खंजर
चुभे जिस दर को मैं सटा

मांगने गया थोड़ी सी सीख
बदले में मेरा अंगूठा कटा

किस गली में ढूंढू तुझे खुदा
तू भी तो है कुनबों में बंटा

धर्मेन्द्र मन्नु

Wednesday, 9 November 2011

ज़िन्दगी समन्दर सी रही....

ज़िन्दगी समन्दर सी रही
प्यास फिर भी बाकी रही

कुछ तुमने कहा कुछ हमने
बात मगर फ़िर भी बाकी रही

रात गुजरी उनके ख्यालों में
सुबहा हुई तो नींद जाती रही

लहरों जैसी रही ज़िन्दगी
सांस आती रही जाती रही

सुबह तक सब ठीक ही था
रौशनी बाद में जाती रही

धर्मेन्द्र मन्नू

Wednesday, 21 September 2011

फिर हल्की सी बरसात हुई खैर नही है....

फिर उनसे मुलाकात हुई खैर नही है
फिर दर्द की शुरुआत हुई खैर नही है

सुनते थे जो फ़साने कभी दोस्तों से हम
वो घटना मेरे साथ हुई खैर नही है

आसमान को देखने लगा हुं आज कल
फिर पंछिओं से बात हुई खैर नही है

उन्से मिल कर वक्त का पता नही चला
कब दिन हुआ कब रात हुई खैर नही है

सदियों की प्यास है, भला कैसे बुझे पल में
फिर हल्की सी बरसात हुई खैर नही है


धर्मेन्द्र मन्नू

Thursday, 15 September 2011

बिन तेरे कहां घर कुछ भी नही....

ज़िन्दगी प्यार वफ़ा कुछ भी नही
मैं तेरे वास्ते अब कुछ भी नही

जब हरा था तो पत्थरें खाया
एक सूखा सा शजर कुछ भी नही

दर्द जो बहता है तो बहने दो
आंसूओं की ये लहर कुछ भी नही

कौन समझेगा इस अफ़साने को
एक बिगड़ी सी बहर कुछ भी नही

चोंच में तिनके लिये उड़ता रहा
बिन तेरे कहां घर कुछ भी नही
धर्मेन्द्र मन्नू