Wednesday, 21 September 2011

फिर हल्की सी बरसात हुई खैर नही है....

फिर उनसे मुलाकात हुई खैर नही है
फिर दर्द की शुरुआत हुई खैर नही है

सुनते थे जो फ़साने कभी दोस्तों से हम
वो घटना मेरे साथ हुई खैर नही है

आसमान को देखने लगा हुं आज कल
फिर पंछिओं से बात हुई खैर नही है

उन्से मिल कर वक्त का पता नही चला
कब दिन हुआ कब रात हुई खैर नही है

सदियों की प्यास है, भला कैसे बुझे पल में
फिर हल्की सी बरसात हुई खैर नही है


धर्मेन्द्र मन्नू

Thursday, 15 September 2011

बिन तेरे कहां घर कुछ भी नही....

ज़िन्दगी प्यार वफ़ा कुछ भी नही
मैं तेरे वास्ते अब कुछ भी नही

जब हरा था तो पत्थरें खाया
एक सूखा सा शजर कुछ भी नही

दर्द जो बहता है तो बहने दो
आंसूओं की ये लहर कुछ भी नही

कौन समझेगा इस अफ़साने को
एक बिगड़ी सी बहर कुछ भी नही

चोंच में तिनके लिये उड़ता रहा
बिन तेरे कहां घर कुछ भी नही
धर्मेन्द्र मन्नू

Friday, 26 August 2011

उनके होंठो पे रुसवाई का बहाना होगा....

दर्द को कही गहरे में छुपाना होगा
सबके सामने हंसना मुस्कुराना होगा

पल पल टूटते हैं विश्वास के किले
ताश के पत्तों को फ़िर से सजाना होगा

भरम रखना है मोहब्बत का दिल में
उस गली में अब रोज़ आना जाना होगा

चुभते हैं कांटे ये उनकी फ़ितरत है
फूलों को अपना दामन बचाना होगा

ऐ लब कभी भूले से नाम ना लेना
उनके होंठो पे रुसवाई का बहाना होगा

धर्मेन्द्र मन्नू

Thursday, 11 August 2011

रोना धोना छोडो यारों...

रोना धोना छोडो यारों
बांह की पेंचें मोडो यारों

बातों से ना कोई सुना है
अब ना हथेली जोडो यारों

सूरज निकल चुका है कब का
अपनी आंखे खोलो यारों

बहरी दुनिया को समझाने
अपनी जुबां से बोलो यारों

जो करती है वार तुम्ही पर
उन हाथों को तोड़ो यारों

धर्मेन्द्र मन्नू

कैसा हो रहा है असर आज पहली बार...

कैसा हो रहा है असर आज पहली बार
होश है न अपनी खबर आज पहली बार

उस शोख से निग़ाह जबसे आज मिली है
हर तरफ़ हैं उसके नज़र आज पहली बार

इस गली से उस गली ढुंढा किये उन्हे
ज़िन्दगी बनी है सफ़र आज पहली बार

मंदिर की ख्वाईश है ना मस्ज़िद का ज़िक्र है
कुफ़्र न खुदा की फ़िकर आज पहली बार

सूरज भी चांद जैसा लगे कैसा है भरम
शाम भी लगे है सहर आज पहली बार

धर्मेन्द्र मन्नू

Thursday, 14 July 2011

जब बम के गोले बजते है...

जब बम के गोले बजते है
तब हम नींदों से जगते है

दो चार गालियां देते है
दो चार सिसकियाँ लेते हैं

दो चार फाइलें इधर ऊधर
दो चार अफसरान इधर उधर

कुछ दिन को आफत आती है
आपा - धापी दे जाती है

कुछ दिन में सब पहले जैसा
फिर वही माजरा होता है

सोने वाले सो जाते हैं
सब अपने कामों में लगते है

धर्मेन्द्र मन्नू

दिल जो तुमने पहलू में छुपा के रखा है....

दिल जो तुमने पहलू में छुपा के रखा है
उसने ही तो दीवाना मुझे बना के रखा है

हमसे नज़र चुराने की कोई तो हो वज़ह
बोलो कहां पे हमसे नज़र बचा के रखा है

जाओ कहां हमसे नज़र बचा के जाओगे
हर राह पे हमने नज़र बिछा के रखा है

कह दो सनम आओ कभी अपना हालेदिल
अपने लबों पे ताला क्यों लगा के रखा है

अपने हर एक ख्वाब की तबीर तुमसे है
तुम्हारे लिये ख्वाब हर सजा के रखा है

धर्मेन्द्र मन्नू